अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 के रंजिशन इस्तेमाल को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने भी जताई चिंता
अनंत आवाज ब्यूरो
लखनऊ। एससी, एसटी एक्ट, यानि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम-1989 30 जनवरी, 1990 को देश में लागू किया गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव और अत्याचारों को रोकना था लेकिन जब से यह कानून अस्तित्व में आया तब से इस कानून के दुरुपयोग की खबरें भी लगातार सुर्खियों में रही हैं। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे लेकर चिंता जताई है।
एससी, एसटी एक्ट (अत्याचार निवारण कानून) की आड़ में इस कुछ लोग व्यक्तिगत रंजिश, बदले की भावना या दबाव बनाने के लिए इस कानून का लगातार गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए अदालतों ने समय-समय पर जांच के निर्देश भी दिए हैं। 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एससी, एक्ट के लगभग 14.78% और एसटी एक्ट के 14.71% मामले झूठे पाए गए थे और केवल 60.38% एससी मामलों और 63.32% एसटी मामलों में चार्जशीट दायर हुई थी, जिससे दोषसिद्धि दर भी गिर गई थी। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की जस्टिस रजनी दुबे की एकलपीठ ने 17 साल पुराने एट्रोसिटी के प्रकरण में बड़ा फैसला सुनाते हुए इस कानून के तहत झूठी रिपोर्ट के आधार पर दर्ज मुकदमे में शिक्षिका अनीता सिंह ठाकुर को बरी कर दिया। तथ्य सामने आने के बाद पता चला कि उनके कार्यालय सहायक ने विद्यालय के दो अध्यापकों के कहने पर उक्त शिक्षिका के खिलाफ एससी, एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज करवाया था। इसी प्रकार का एक ताजा मामला उत्तर प्रदेश से भी सामने आया है।

एससी, एसटी एक्ट (अत्याचार निवारण कानून) के दुरुपयोग के इस मामले में चुनावी रंजिश के चलते ग्राम प्रधान पर मारपीट व एससी, एसटी एक्ट का फर्जी मुकदमा दर्ज कराने वाली गुड्डी को एससी, एसटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने डेढ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। आदेश की एक प्रति जिलाधिकारी लखनऊ को इस निर्देश के साथ भेजी गई है कि गुड्डी को कोई राहत धनराशि दी है, तो उसे तत्काल वापस लिया जाए। सरकारी वकील अरविंद मिश्रा ने न्यायालय को बताया कि दोषी महिला के देवर और ग्राम प्रधान महिला के पति मथुरा प्रसाद, विनोद अवस्थी व अनूप अवस्थी के बीच प्रधानी के चुनाव को लेकर विवाद चल रहा था। इस दुश्मनी के चलते दोषी महिला ने अपने देवर के कहने पर 15 नवंबर 2024 को थाने में विपक्षियों के खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज कराया था। दोषी महिला ने आरोप लगाया था कि जब वह अपने देवर राजू के साथ ग्राम जगदीशपुर से दवा लेकर लौट रही थी तो रास्ते में विपक्षियों ने उसे और उसके देवर को जबरन रोककर गालियां दीं और मारा-पीटा।
इस मामले एसीपी अमोल मुरकुट ने जब जांच की तो पता चला कि घटना के समय आरोपित अनूप अवस्थी फैजुल्लागंज में था और बाकी दोनों मथुरा प्रसाद के घर पर थे। इतना ही नहीं जांच में यह भी पाया गया कि कोई घटना घटित हुई ही नहीं थी। इसके बाद विवेचक ने मामले में अंतिम रिपोर्ट लगा दी और आरोपित गुड्डी के खिलाफ झूठा मुकदमा लिखाने का परिवाद न्यायालय में दाखिल किया गया।
न्यायालय ने कहा कि 73वें संविधान संशोधन के द्वारा त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को अपने देश में लागू किया गया। वह ग्रामीण विकास को नए आयाम दे रही है। इसके अलावा ग्रामीण समाज में वैमनस्यता को भी बढ़ा रही है। गांव के लोग एक दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे है वहीं, एससी-एसटी एक्ट को लेकर माननीय उच्च न्यायालय ने भी इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि यह एक्ट अनुसूचित जाति जनजाति के सदस्यों को अत्याचार के विरुद्ध उपचार के लिए बनाया गया था, उसको हथियार बनाकर अनेक व्यक्तियों द्वारा निर्दोष लोगों को फंसाया जा रहा है, जिससे वास्तव में जो जरूरतमंद है उनको न्याय पाने में कठिनाई हो रही है।
न्यायालय ने आदेश की प्रति जिलाधिकारी और पुलिस आयुक्त को भेजने का आदेश देते हुए कहा कि विधायिका का यह बिल्कुल आशय नहीं था कि करदाताओं के बहुमूल्य धन को झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वालों को राहत के रूप में दिया जाए।





