विरोध और प्रतिबंधों के कांटों भरे मार्गो पर चलते हुए बढ़ता गया आरएसएस का कांरवा
निशीथ सकलानी
विश्व के एकमात्र अद्वितीय, अद्भुत और प्रभावशाली संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के राष्ट्र आराधन के 100 पूरे होने पर देशभर में जबरदस्त उत्साह का माहौल है। विजयादशमी के अवसर पर देशभर में आयोजित उत्सवों में शस्त्र पूजन, पथ संचलन और सामाजिक संदेशों के माध्यम से संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के शुभारंभ का शंखनाद कर दिया है। इसके तहत संघ पूरे वर्ष देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों का भी आयोजन कर रहा है। इन कार्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य समाज में एकता, सद्भाव और राष्ट्र निर्माण को बढ़ावा देना है।
शताब्दी वर्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) समाज में शक्ति और एकता के प्रदर्शन की मिसाल के रूप में देशभर में स्वयं सेवकों के पथ संचलन कार्यक्रम आयोजित करने के साथ-साथ भाईचारे और राष्ट्र निर्माण में सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए हिंदू सम्मेलनों का आयोजन भी करेगा। नवंबर 2025 से जनवरी 2026 तक तीन सप्ताह के लिए बड़े पैमाने पर ‘हर गांव, हर बस्ती, घर-घर’ संपर्क अभियान चलाया जाएगा। खंड और नगर स्तर पर सामाजिक सद्भाव बैठकें आयोजित की जाएंगी, जिनमें एक साथ मिलकर रहने पर बल दिया जाएगा। इन बैठकों का उद्देश्य भी समाज में सद्भाव और एकता को बढ़ावा देना है। इसके अलावा प्रांत स्तर पर युवाओं के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें राष्ट्र निर्माण, सेवा गतिविधियों और पंच परिवर्तन पर केंद्रित कार्यक्रम होंगे। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य युवाओं को संघ के विचारों और मूल्यों से जोड़ना है। जिला स्तर पर प्रमुख नागरिक गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा, जिनमें राष्ट्रीय विषयों पर चिन्तन-मनन किया जायेगा और प्रचलित गलत धारणाओं को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। संघ नवंबर 2025 से जनवरी 2026 तक तीन सप्ताह तक घर-घर संपर्क अभियान भी चलाया जाएगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और उनके पश्चात सर संघचालक के रूप में माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी), मधुकर दत्तात्रेय देवरस (बालासाहेब देवरस), प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया), कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन और वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत (मोहन भागवत) के राष्ट्र के प्रति समर्पण, अथक प्रयासों ने आज इस संगठन को विश्व पटल पर एक विशाल वटवृक्ष के रूप में स्थापित करने के साथ-साथ देश की एकता, अखंडता और समरसता के लिए एक लम्बी लाईन खिंचने का काम किया है। इस समय पूरे देश में 55000 से अधिक संघ की शाखाएं लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के विश्वभर में लगभग 80 से अधिक देशों में 50 से ज्यादा ख्याति प्राप्त संगठन हैं और उसके लगभग 200 से अधिक संगठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का प्रमुख अनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आज जहां विद्यार्थियों के लिए काम करने वाला सबसे बड़ा और एक आदर्श संगठन है तो वहीं संघ की विचारधारा के अनुरूप राजनीतिक क्षेत्र में कार्य करने वाला राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी विश्व के सबसे अधिक कार्यकर्ताओं के साथ आज केंद्र एवं कई राज्यों में कुशलता पूर्वक सत्ता का संचालन कर रहा है। जबकि वहीं विश्व हिंदू परिषद हिंदू हमारे धर्म एवं आस्था के प्रमुख केन्द्रों के संरक्षण के लिए समाज में वर्षों से जन जाग्रति करने का काम कर रहा है।
विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन और संघर्षों का ही परिणाम था कि श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण का कार्य अपने मुकाम तक पहुंच पाया। इसी प्रकार महिलाओं के बीच काम करने वाला संगठन राष्ट्रीय सेविका समिति महिलाओं को सशक्त करने के साथ-साथ उन्हें अबला से सबला बनाने का काम कर रही है। वनवासी और आदिवासी समुदायों के लिए काम करने वाला वनवासी कल्याण आश्रम भी आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। विद्या भारती शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाला संगठन है तो स्वदेशी जागरण मंच स्वदेशी उत्पादों और अर्थव्यवस्था के लिए काम करने वाला संगठन है। इसी प्रकार भारतीय मजदूर संघ आरएसएस का ऐसा विशाल अनुषांगिक संगठन है जो श्रमिकों के हितों के लिए काम करता है। इसके अलावा भी संघ के ऐसे कई प्रभावशाली अनुसांगिक संगठन हैं जिनके माध्यम से RSS ने समाज के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों में अपनी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपने 100 वषों के सफर में बड़ी-बड़ी चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया है। इतना ही नहीं उसने इन चुनौतियों को अवसरों में परिवर्तित कर अपने लिए एक सशक्त आधार को भी तैयार करने का काम किया है। इन चुनौतियों ने संघ को और भी अधिक विस्तार देने के अलावा पहले से भी मजबूत और शक्तिशाली बनाया है। 27 सितंबर 1925 विजयादशमी के दिन जब से संघ की स्थापना हुई है तब से लेकर आज तक वामपंथियों और तथाकथित सेक्युलरवादियों द्वारा लगातार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दुनियां के हर मंच पर विरोध किया जाता रहा है। लेकिन संघ ने अपनी दृढ़ता और संगठनात्मक क्षमता के बल पर इन विरोधों और चुनौतियों हर समय माकूल जवाब दिया है।
संघ को समाप्त करने की नियत से 1975 में तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगा दिया गया था और संघ के कई स्वयंसेवकों को जेल में डाल दिया गया। इस दौरान संघ ने अपनी गतिविधियों को गुप्त रूप से चलाया और आपातकाल के बाद फिर से सक्रिय हो गया। संघ ने विभिन्न वर्गों और समुदायों के बीच समरसता बढ़ाने के लिए काम किया है। पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की भी कोशिश की है, जो एक बड़ी चुनौती थी। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद RSS ने अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर निष्काम भाव से राष्ट्र निर्माण से व्यक्ति निर्माण का काम करते हुए समाज में एक विश्वास स्थापित किया। इसी का परिणाम है कि आज RSS ने सबसे विशाल स्वत: स्फूर्त संगठन के रूप में विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
भागवत बोले वैश्विक चिंताओं के समाधान के लिए विश्व भारत की ओर देख रहा है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को नागपुर मुख्यालय में आयोजित ‘विजयादशमी उत्सव’ के अवसर पर शस्त्र पूजा कर आरएसएस की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने अपने संबोधन में कहा कि “वैश्विक चिंताओं के समाधान के लिए विश्व भारत की ओर देख रहा है। ब्रह्मांड चाहता है कि भारत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए विश्व को राह दिखाए।”
संघ के शताब्दी समारोह की औपचारिक शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि “विविधता और हमारी संस्कृति का पूर्ण स्वीकार और सम्मान जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है, वही राष्ट्रवाद है, जिसे हम हिंदू राष्ट्रवाद कहते हैं। यही हमारे लिए हिंदू राष्ट्रवाद है। हिंदवी, भारतीय और आर्य, ये सभी हिंदू के पर्यायवाची हैं। हमारे यहाँ कभी भी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा नहीं रही। हमारी संस्कृति ही हमारे राष्ट्र का निर्माण करती है। राज्य आते-जाते रहते हैं, लेकिन राष्ट्र सदैव बना रहता है। यही हमारा प्राचीन हिंदू राष्ट्र है। हमने हर प्रकार के उत्थान-पतन देखे हैं, हमने गुलामी देखी है, हमने आज़ादी देखी है, लेकिन हम इन सबसे उबरकर आए हैं। इसीलिए एक सशक्त और एकजुट हिंदू समाज ही देश की सुरक्षा और अखंडता की गारंटी है। हिंदू समाज एक ज़िम्मेदार समाज है। हिंदू समाज हमेशा से ‘हम और वे’ की इस मानसिकता से मुक्त रहा है।”





